सशक्त नारी सशक्त समाज

         

 नारी शब्द स्त्री वाचक है ,जो स्त्री पर्याय का बोध कराता हैं।   इस संपूर्ण संसार में शायद ही कोई नारी के प्रेम रूपी सौंदर्य से अछूता रहा हो , मां की ममता से , बहन का प्यार से , पत्नी के सहयोग से.... कहीं ना कहीं से आंचलिक अनुभूति प्राप्त तो की ही होगी, और कहा भी जाता है कि "  हर कामयाब पुरुष   के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है "       बात भी सही है कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप से महिला   (स्त्री पर्याय) सहायता करती ही है , अब चाहे आर्थिक हो या   मानसिक। यह तो सोचने की बात है ,

कि जिस समाज में स्त्री जाति का सरस्वती, गौरी, भवानी, देवी, आदि के रूप में सौंदर्य पूर्ण वर्णन किया गया हो , जहां पर देवियों  (पार्वती, काली)को देवताओं से अधिक ओजपूर्ण एवं शक्तिशाली बताया गया हो ।

वहां पर स्त्रियों की दुर्दशा कैसे हो सकती है ?   नहीं तो 

वहां का समाज पुरुष प्रधान कैसे हो सकता है ?


जरा अपने परिवार में ध्यान आकर्षित करते हैं, कि परिवार में वृद्धजन ही घर के बड़े कार्यों का निर्णय लेते हैं पर दादाजी भी दादी जी से ही पूछ कर हर काम करते हैं तो यह समाज , पुरुष प्रधान कैसे हो सकता है।

Tohar

                               समाज और परिवार की रीति-रिवाज को कहीं सीखा सिखाया नहीं जाता है यह तो पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार द्वारा अपनाई जाती है किंतु इन रीति-रिवाजों में स्त्री का अभाव हो ,तो इन रीति-रिवाजों का रस एवं सुख पल भर भी ना रह सकेगा और व्यक्ति पग पग पर क्रोध एवं ‌चिढ-चिडा बन जाएगा , और जिससे संपूर्ण समाज प्रभावित होगा। स्त्रियों को सामाजिक आवरण से वंचित करना देश को की संस्कृति को खोना है स्त्रियों को सम्मान का जीवन प्रदान ना किया जाए तो आने वाली पीढ़ी भी ' असंस्कारित एवं अस्वाभिमानी ' होगी क्योंकि " किसी शिशु की प्रथम गुरु उसकी मां होती है " 

                       विज्ञान का यह तथ्य है कि जब कोई व्यक्ति अपनी मां से बात करता है तो वह कई हद तक तनाव मुक्त हो जाता है l स्त्री ,पुरुषों से अधिक भावनात्मक होती है , कििंतु वर्तमान में देखा जाय तो शिक्षा में देखा जाए तो , लड़कों से ज्यादा लड़कियां श्रेष्ठ हैं तो क्या हम यह कह नहीं सकते कि स्त्री मानसिक रूप से भी सुदृढ़ होती है,


और जब कोई महिला किसी शिशु को जन्म जन्म देती है, तो 20 हड्डियों के टूटने के बराबर दर्द होता है।  इससे पता चलता है की महिलाएं शारीरिक एवं मानसिक रूप से पुरुषों की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ होती हैं।

                                   भारतीय समाज में विलासिता का कारण और स्त्रियों के प्रति समाज में अरुचि का कारण मुगल शासकों को माना जा सकता है क्योंकि मुगल शासकों की आने से ही भारतीय समाज में उथल-पुथल प्रारंभ हुआ। बाबर (बाबर इम्परातोरलुग़ु) सन 1526 में भारत आया और उसके वंशजों द्वारा भारत पर 1526–1857 तक राज किया गया, मुगलों के शासन में नवाब (राजा) के सम्मान में सभा में नर्तकी नृत्य करवाया जाता था,

                                      जिसका उद्देश्य मनोरंज था, किंतु धीरे–धीरे समाज ने नर्तकी को वैश्या कह कर समाज में एक छोटा सा हिस्सा प्रदान किया जिस कारण से समाज में स्त्री जाति का प्रभाव कम हो गया और अंग्रेजों के आने से स्त्री जीवन और भी संकुचित हो गया

Written by

Gamer Sandesh

Comments

Sandesh Saraf said…
Comment here
Kesa laga, kuch naya padne mila , etc??
Unknown said…
Nice lines..❤️
Unknown said…
Bahut badiya

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